Tuesday, September 9, 2008
कुछ तो बात है-
उस शांत चेहरे को देख केर लगता है जैसे वक्त रुक सा गया है, पर ये तो एक पर्दा था - जो वक्त के थपेडे ने उसे पहना दिया था। अनचाहे उसे एक नया चेहरा मिल गया था - जिसकी अब उसे आदत हो गई है। कई बार जब वो एकांत में बैठा सोचता है तो उसे लगता है - वो ख़ुद में एक अजनबी है , जिसे बर्षो लग गए - एक पहचान बनने में - जिसे वो अब नही जानना चाहता । पर समाज को इस से क्या फर्क पड़ता है - वो तो उस पर्दे को ही उसका असली चेहरा समझन चाहते है क्योकि उसमे उन्हें वो दीखता है जो वो देखना चाहते है।
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3 comments:
beautiful....n very true....infact I reflect my face in ur words...very well written
Kuch to baat hai dost ..wah ...
today realized your strong poetic base after Viky told me to take a look at this piece of wonderful Hindi
narration.
You do carry a golden heart. .....
But be a little bit more prolific.
Keep writing
bye
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