Tuesday, September 9, 2008

कुछ तो बात है-

उस शांत चेहरे को देख केर लगता है जैसे वक्त रुक सा गया है, पर ये तो एक पर्दा था - जो वक्त के थपेडे ने उसे पहना दिया था। अनचाहे उसे एक नया चेहरा मिल गया था - जिसकी अब उसे आदत हो गई है। कई बार जब वो एकांत में बैठा सोचता है तो उसे लगता है - वो ख़ुद में एक अजनबी है , जिसे बर्षो लग गए - एक पहचान बनने में - जिसे वो अब नही जानना चाहता । पर समाज को इस से क्या फर्क पड़ता है - वो तो उस पर्दे को ही उसका असली चेहरा समझन चाहते है क्योकि उसमे उन्हें वो दीखता है जो वो देखना चाहते है।